Wednesday, July 10, 2019
शिक्षा एक व्यवसाय : Market in Indian Education System
पहले शिक्षा एक उपहार हुआ करता था जो बिना किसी धन के बस मेहनत, लगन , और ईमानदारी से पूरा हुआ करता था फिर धीरे - धीरे इसमें धन के बदले कुछ अन्य वस्तुए देने का प्रचलन चल पड़ा और धीरे से कब हमारी शिक्षा बाज़ारू और बिकने वाली हो गयी किसी को कुछ पता नहीं चला। ये एकदम नहीं हुआ है अपितु बहुत ही क्रमबद्ध और न पता चलने वाले तरीके से हुआ है यहाँ तक की शिक्षा में भौतिक सुख संसाधन कब जुड़ गए किसी को पता नहीं चला और हमारे गुरु व शिक्षक कब शिक्षा के बदले धन दौलत और अन्य वस्तुए लेने लग गए ये भी पता नहीं चला।
ये बात बिलकुल सच्च है की बिना धन के आज शिक्षा को प्राप्त करना असंभव है। आज की बात करें तो चाहे वो टीचर हों अथवा छात्र दोनों ही एक दूसरे को धोखा दे रहे हैं। माता पिता को बस पैसे कमाने की पड़ी है बच्चा क्या कर रहा है उनको इस बात से लेना देना नहीं है वो ये चाहते है की हमारा बच्चा बस किसी बड़े स्कूल या कोचिंग में पढ़े पैसे की परवाह नहीं है वो कितना भी लग जाये इसी बात ने हमारी शिक्षा को बर्बाद कर दिया है। टीचर भी ये चाहते है की बच्चो को पढ़ना न पड़े अगर पढ़ना भी पड़े तो उनको तो बस अपने टीचिंग के घंटे काटना होते है वो कैसे भी काट लेते हैं। स्कूल, कोचिंग संचालक बहुत बड़ी फीस लेकर अड्मिशन देते हैं और कुछ न कुछ बहाने से अभिभावकों की जेब काटते रहते हैं इस पर कोई कुछ नहीं बोलता जैसे की सबको सांप सूंघ गया हो। सरकारी स्कूल तो वैसे भी ख़राब हालत में है जहा पर सिवाय बेहद गरीब बच्चों के अलावा कोई नहीं जाना चाहता है कोई अधिकारी वहा का जायजा लेने नहीं जाता है। टीचर भी यदा कदा आते हैं आते है तो धूप में गप्पें मरते रहते हैं।
एक मिडिल क्लास आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं भेजना चाहता है वो ये चाहता है की मेरे बच्चो को अच्छी शिक्षा मिले पर प्राइवेट स्कूल में भी उसको सिवाय लूटपाट के कुछ खास नहीं मिलता है।मोटी स्कूल व टूशन की फीस भरता है कही इसके नाम पर कभी उसके नाम पर फीस बसूली जाती है और हम कुछ नहीं कर पते हैं ये शिक्षा पद्धति हमारे आने वाले टाइम के लिए बहुत ही घातक सिद्ध होगी और शिक्षा नाम की अमूल्य वास्तु का नमो निशान मिट जायेगा। हर कोई पैसा कामना चाहता है चाहे वो बच्चो का भविष्य की कीमत पर ही क्यू न मिले , प्राइवेट संस्थानों ने बिना कट्टे , बन्दूक लिए ही लूट मचा राखी है कोई सुनने को तैयार नहीं। सरकारी अफसर बातें तो बहुत करते है पर जब उनके बच्चो को सरकारी स्कूलों में पढ़ने की बात आती है तो कन्नी काट लेते हैं और बहुत सी दलील दे डालते हैं।
हमारी शिक्षा का स्तर बहुत नीचे गिरता जा रहा है जिसको अभी बिना कोई विलम्ब किये सुधारा जाना बहुत आवश्य्क है वार्ना बहुत देर हो चुकी होगी। हमारी सरकारें बाते बहुत करती है पर शिक्षा में सुधर के लिए कोई ठोस योजना नहीं है और न ही इस संबध में को ठोस निर्देश। ऐसा कोई कानून नहीं बन सकता है जहा पर ये लगे की बहुत ही शानदार योजना है सिवाय बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए। क्लासो में स्टूडेंट नहीं हैं सिनेमा , क्लब, पार्को , कैफ़े , रेस्टोरेंट , पब में स्टूडेंट्स मिलते हैं कोई रोकटोक नहीं है। क्लास में ही मोबाइल पर मूवीज देखना आम बात है। पढाई पर कोई ध्यान नहीं है किसी को रोक नहीं सकते क्यूंकि कानून ऐसा बना दिया गया है की आप स्टूडेंट्स को डांट भी नहीं सकते वार्ना मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है यही से सुरु होता है हमारी शिक्षा का सत्यानाश। आज किसी स्टूडेंट्स को पूछ लो की 15 का पहाड़ा सुना दे , मजाल है कोई सुना दे अथवा कोई ये बता दे की हिंदी बारहखड़ी कैसे लिखी जाती है या ऋ कैसे लिखी जाती है और इसका उपयोग कहा होता है। ये है हमारी बिंदास शिक्षा पद्धति, अफ़सोस होता है और फ़र्क़ भी क्यूंकि हमने बहुत पहले पढ़ लिया वार्ना आज कुछ नहीं पढ़ पाते।
आज का टीवी , सिनेमा ने हर स्टूडेंट का सत्यानाश कर दिया है हर कोई सिनेमा में होने वाली घटना को जी रहा है , प्यार मुहबत और छिछोरापन , आवारगी करना हर स्टूडेंट का सगल बन गया है। जब शिक्षा के मंदिर में ऐसी चीजे देखने और करने को मिल जाये तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं की आप और हमारा समाज और शिक्षा कहा जा रही है। अकेले छात्र की नहीं अव्वल हो ये है की टीचर्स का भी रोमांस आये दिन चर्चा का विषय बन गया है जब हालत ऐसे हो तब क्या कहियेगा। गहरे चिंतन की जरुरत है ये। हम क्यू नहीं बदलना चाहते हैं दो कारण है पहला हमारे संस्कार ही कुछ ऐसे हो या हमारे अंदर ही ऐसे विचार हो और दूसरा हम कुछ नहीं कर कर सकते क्यूंकि हमको क्या पड़ी जो दूसरों के मामलों में युहीं पड़े।
आज हर जगह स्कूल्ज , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स दुकान लेके खुल गए हैं। ऐसा लगता है की ये शिक्षा की स्थान न होकर दुकान हैं। गली , मोहल्ले , सड़क पर ये खुल चुके हैं आपको लूटने के लिए। बड़े - बड़े ऑफर्स के साथ जो आपको हर हालत में अच्छे लगेंगे और कही न कंही आप इनमें फंस जायेंगे।
अगर आप अपने बच्चे के एडमिशन के लिए जा रहे है तो आप कही न की तो जायेंगे ही। टीवी , मोबाइल , और शहर में होर्डिंग्स पर लगे विज्ञापन को देखकर जरूर एक बात की तसल्ली लेने की वाकई वही है जो दिखाया गया है। स्कूल्ज में एक खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट बैठी होगी जो आपको वेलकम करेगी फिर आपकी आवभगत करेगी ठंडा , गरम ऑफर करेगी फिर आपको उस संस्था की तमाम खूबियों का बखान करेगी और फलां और बड़े अधिकारिओं के बच्चों के पढ़ने का दवा करेगी और आपको वह पर अड्मिशन दिलाने में जोर लगा देगी फिर सुरु होगा आपको लूटने का सिलसिला , एड्मिशन फॉर्म से लेकर आपसे एग्जाम फी तक की वसूल की जाएगी और आप मजबूर होके देते जायेंगे। ये हर जगह स्कूल्ज , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स में आम आदमी के साथ होता है अगर कोई प्रॉब्लम है तो सुनने वाला कोई नहीं होगा। अगर आप सरकार में कोई शिकायत करते हैं तो भी आपने हाथ हर हालत में निराशा ही लगेगी। इनमे आपने हर चीज की 100 गुणा कीमत वसूली जाएगी, किताबों , ड्रेस , बेल्ट, शूज , बैग्स यहाँ तक की आपका बच्चा लंच में क्या खायेगा स्कूल्ज ही निर्धारण करेंगे।
स्कूलों , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स की मनमानी को रोकने के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास नफाफी हैं। कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए है इस सम्बन्ध में न ही कोई कारवाही का निर्धारण किया गया है। इनकी मनमानी जोरो पर है। कोई भी सरकारी अधिकारी इन संस्थानों का निरीक्षण नहीं करता ना ही वो ये प्रयास करता है की वह पर कैसा चल रहा है शिक्षा की प्रक्रिया कैसे चलते हैं ये लोग। क्या फीस ली जा रही है और फीस के बदले उनको क्या शिक्षा दी रही है वो सही है। जिससे शिक्षा का बेडा गर्क हो रहा है।
इसे क्या समझा जाये की सरकार के नुमाइंदे ही शिक्षा पद्त्ति को बर्बाद करने में तुले हुए हैं। या फिर सरकार द्वारा एक मोटी रकम लेकर अपने कर्त्वयों से नाता तोड़ लेते हैं या फिर संस्थानों के मालिकों द्वारा सरकारी मामलो में बड़ा हस्तक्षप रहता है।
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