Saturday, October 5, 2019

घर से भागी हुई एक लड़की

3:39 AM 1
*कहानी - घर से भागी हुई एक लड़की की *

ट्रेन के AC. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा " हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की पिन है ?" 

🔴 उसने अपने बैग से एक फोन निकाला था, और नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और सीट के नीचे से अपना बैग निकालकर उसके टूल बॉक्स से पिन ढूंढकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी। 

🔴 थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी??"

वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। और एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी। 

लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों?? 

🔴 मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना"

लड़की बुदबुदाई "ओह्ह "

🔴 मैंने दिलासा देते हुए कहा "इसमे कोई परेशानी की कोई बात नहीं"

वो अपने एक हाथ से दूसरा हाथ दबाती रही, मानो किसी परेशानी में हो। मैंने फिर विन्रमता से कहा "आपको कहीं कॉल करना हो तो मेरा मोबाइल इस्तेमाल कर लीजिए"

🔴 लड़की ने कहा "जी फिलहाल नहीं, थैंक्स, लेकिन ये सिम किस नाम से खरीदी गई है मुझे नहीं पता"

मैंने कहा "एक बार एक्टिव होने दीजिए, जिसने आपको सिम दी है उसी के नाम की होगी" 

उसने कहा "ओके, कोशिस करते हैं" 

मैंने पूछा "आपका स्टेशन कहाँ है??"

लड़की ने कहा "दिल्ली"

और आप?? लड़की ने मुझसे पूछा 

🔴 मैंने कहा "दिल्ली ही जा रहा हूँ, एक दिन का काम है, आप दिल्ली में रहती हैं या...?"

लड़की बोली "नहीं नहीं, दिल्ली में कोई काम नहीं ना मेरा घर है वहाँ"

तो? मैंने उत्सुकतावश पूछा

🔴 वो बोली "दरअसल ये दूसरी ट्रेन है, जिसमें आज मैं हूँ, और दिल्ली से तीसरी गाड़ी पकड़नी है फिर हमेशा के लिए आज़ाद" 

आज़ाद??
लेकिन किस तरह की कैद से? 
मुझे फिर जिज्ञासा हुई किस कैद में थी ये कमसिन अल्हड़ सी लड़की.. 

🔴 बोली, उसी कैद में थी जिसमें हर लड़की होती है जहाँ घरवाले कहे शादी कर लो, जब जैसा कहे वैसा करो। मैं घर से भाग चुकी हूँ..

मुझे ताज्जुब हुआ मगर अपने ताज्जुब को छुपाते हुए मैंने हंसते हुए पूछा "अकेली भाग रही हैं आप? आपके साथ कोई नजर नहीं आ रहा? "

वो बोली "अकेली नहीं, साथ में है कोई"

कौन? 
मेरे प्रश्न खत्म नहीं हो रहे थे

🔴 दिल्ली से एक और ट्रेन पकड़ूँगी फिर अगले स्टेशन पर वो मिलेगा और उसके बाद हम किसी को नहीं मिलेंगे..

ओह्ह, 
तो ये प्यार का मामला है। 

उसने कहा "जी"

मैंने उसे बताया कि 'मैंने भी लव मैरिज की है।'

ये बात सुनकर वो खुश हुई, बोली "वाओ, कैसे कब?" लव मैरिज की बात सुनकर वो मुझसे बात करने में रुचि लेने लगी।

मैंने कहा "कब कैसे कहाँ? वो मैं बाद में बताऊंगा पहले आप बताओ आपके घर में कौन कौन है?

🔴 उसने होशियारी बरतते हुए कहा " वो मैं आपको क्यों बताऊं? मेरे घर में कोई भी हो सकता है, मेरे पापा माँ भाई बहन, या हो सकता है भाई ना हो सिर्फ बहने हो, या ये भी हो सकता है कि बहने ना हो और 2-4 मुस्टंडे भाई हो" 

मतलब मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकता "मैंने काउंटर मारा"

वो बोली, 'कुछ भी नाम हो सकता है मेरा, टीना, मीना, शबीना, अंजली कुछ भी' 

बहुत बातूनी लड़की थी वो.. थोड़ी इधर उधर की बातें करने के बाद उसने मुझे टॉफी दी जैसे छोटे बच्चे देते हैं क्लास में, बोली आज मेरा बर्थडे है। 

मैंने उसकी हथेली से टॉफी उठाते बधाई दी और पूछा "कितने साल की हुई हो?"

वो बोली "18" 

"मतलब भागकर शादी करने की कानूनी उम्र हो गई आपकी" मैंने काउंटर किया

वो "हंसी"

कुछ ही देर में काफी फ्रैंक हो चुके थे हम दोनों। जैसे बहुत पहले से जानते हो एक दूसरे को.. 

मैंने उसे बताया कि "मेरी उम्र 28 साल है, यानि 10 साल बड़ा हुँ"

उसने चुटकी लेते हुए कहा "लग भी रहे हो"

मैं मुस्कुरा दिया

मैंने उसे पूछा "तुम घर से भागकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर चिंता के निशान जरा भी नहीं है, इतनी बेफिक्री मैंने पहली बार देखी" 

🔴 खुद की तारीफ सूनकर वो खुश हुई, बोली "मुझे उसने(प्रेमी ने) पहले से ही समझा दिया था कि जब घर से निकलो तो बिल्कुल बिंदास रहना, घरवालों के बारे में बिल्कुल मत सोचना, बिल्कुल अपना मूड खराब मत करना, सिर्फ मेरे और हम दोनों के बारे में सोचना और मैं वही कर रही हूँ"

मैंने फिर चुटकी ली, कहा "उसने तुम्हे मुझ जैसे अनजान मुसाफिरों से दूर रहने की सलाह नहीं दी?"

उसने हंसकर जवाब दिया "नहीं, शायद वो भूल गया होगा ये बताना"

🔴 मैंने उसके प्रेमी की तारीफ करते हुए कहा " वैसे तुम्हारा बॉय फ्रेंड काफी टेलेंटेड है, उसने किस तरह से तुम्हे अकेले घर से रवाना किया, नई सिम और मोबाइल दिया, तीन ट्रेन बदलवाई.. ताकि कोई ट्रेक ना कर सके, वेरी टेलेंटेड पर्सन" 

लड़की ने हामी भरी,बोली " बोली बहुत टेलेंटेड है वो, उसके जैसा कोई नहीं"

मैंने उसे बताया कि "मेरी शादी को 5 साल हुए हैं, एक बेटी है 2 साल की, ये देखो उसकी तस्वीर" 

मेरे फोन पर बच्ची की तस्वीर देखकर उसके मुंह से निकल गया "सो क्यूट"

🔴 मैंने उसे बताया कि "ये जब पैदा हुई, तब मैं कुवैत में था, एक पेट्रो कम्पनी में बहुत अच्छी जॉब थी मेरी, बहुत अच्छी सेलेरी थी.. फिर कुछ महीनों बाद मैंने वो जॉब छोड़ दी, और अपने ही कस्बे में काम करने लगा।" 

लड़की ने पूछा जॉब क्यों छोड़ी?? 

मैंने कहा "बच्ची को पहली बार गोद में उठाया तो ऐसा लगा जैसे जन्नत मेरे हाथों में है, 30 दिन की छुट्टी पर घर आया था, वापस जाना था लेकिन जा ना सका। इधर बच्ची का बचपन खर्च होता रहे उधर मैं पूरी दुनिया कमा लूं, तब भी घाटे का सौदा है। मेरी दो टके की नौकरी, बचपन उसका लाखों का.." 

🔴 उसने पूछा "क्या बीवी बच्चों को साथ नहीं ले जा सकते थे वहाँ?"

मैंने कहा "काफी टेक्निकल मामलों से गुजरकर एक लंबी अवधि के बाद रख सकते हैं, उस वक्त ये मुमकिन नहीं था.. मुझे दोनों में से एक को चुनना था, आलीशान रहन सहन के साथ नौकरी या परिवार.. मैंने परिवार चुना अपनी बेटी को बड़ा होते देखने के लिए। मैं कुवैत वापस गया था, लेकिन अपना इस्तीफा देकर लौट आया।"

लड़की ने कहा "वेरी #इम्प्रेसिव" 

मैं मुस्कुराकर खिड़की की तरफ देखने लगा

🔴 लड़की ने पूछा "अच्छा आपने तो लव मैरिज की थी न,फिर आप भागकर कहाँ गए?? कैसे रहे और कैसे गुजरा वो वक्त??

उसके हर सवाल और हर बात में मुझे महसूस हो रहा था कि ये लड़की लकड़पन के शिखर पर है, बिल्कुल नासमझ और मासूम। 

मैंने उसे बताया कि हमने भागकर शादी नहीं की, और ये भी है कि उसके पापा ने मुझे पहली नजर में सख्ती से रिजेक्ट कर दिया था।" 

उन्होंने आपको रिजेक्ट क्यों किया?? लड़की ने पूछा

🔴 मैंने कहा "रिजेक्ट करने की कुछ भी वजूहात हो सकती है, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा कुल कबीला घर परिवार नस्ल या नक्षत्र..इन्ही में से कोई काट होती है जिसके इस्तेमाल से जुड़ते हुए रिश्तों की डोर को काटा जा सकता है" 

"बिल्कुल सही", लड़की ने सहमति दर्ज कराई और आगे पूछा "फिर आपने क्या किया?"

🔴 मैंने कहा "मैंने कुछ नहीं किया,उसके पिता ने रिजेक्ट कर दिया वहीं से मैंने अपने बारे में अलग से सोचना शुरू कर दिया था। खुशबू ने मुझे कहा कि भाग चलते हैं, मेरी वाइफ का नाम खुशबू है..मैंने दो टूक मना कर दिया। वो दो दिन तक लगातार जोर देती रही, कि भाग चलते हैं। मैं मना करता रहा.. मैंने उसे समझाया कि "भागने वाले जोड़े में लड़के की इज़्ज़त वकार पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता, जबकि लड़की का पूरा कुल धुल जाता है। फिल्मों में नायक ही होता है जो अपनी प्रेमिका को भगा ले जाए और वास्तविक जीवन में भी प्रेमिका को भगाकर शादी करने वाला नायक ही माना जाता है। लड़की भगाने वाले लड़के के दोस्तों में उस लड़के का दर्जा बुलन्द हो जाता है, भगाने वाला लड़का हीरो माना जाता है लेकिन इसके विपरीत जो लड़की प्रेमी संग भाग रही है वो कुल्टा कहलाती है, मुहल्ले के लड़के उसे चालू ठीकरा कहते हैं। बुराइयों के तमाम शब्दकोष लड़की के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। भागने वाली लड़की आगे चलकर 60 साल की वृद्धा भी हो जाएगी तब भी जवानी में किये उस कांड का कलंक उसके माथे पर से नहीं मिटता। मैं मानता हूँ कि लड़का लड़की को तौलने का ये दोहरा मापदंड गलत है, लेकिन है तो सही.. ये नजरिया गलत है मगर अस्तित्व में है, लोगों के अवचेतन में भागने वाली लड़की की भद्दी तस्वीर होती है। मैं तुम्हारी पीठ को छलनी करके सुखी नहीं रह सकता, तुम्हारे माँ बाप को दुखी करके अपनी ख्वाहिशें पूरी नहीं कर सकता।"

वो अपने नीचे का होंठ दांतो तले पीसने लगी, उसने पानी की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूंट अंदर सरकाया। 

🔴 मैंने कहा अगर मैं उस दिन उसे भगा ले जाता तो उसकी माँ तो शायद कई दिनों तक पानी भी ना पीती। इसलिए मेरी हिम्मत ना हुई कि ऐसा काम करूँ.. मैं जिससे प्रेम करूँ उसके माँ बाप मेरे माँ बाप के समान ही है। चाहे शादी ना हो, तो ना हो। 

कुछ पल के लिए वो सोच में पड़ गई , लेकिन मेरे बारे में और अधिक जानना चाहती थी, उसने पूछा "फिर आपकी शादी कैसे हुई???

मैंने बताया कि " खुशबू की सगाई कहीं और कर दी गई थी। धीरे धीरे सबकुछ नॉर्मल होने लगा था। खुशबू और उसके मंगेतर की बातें भी होने लगी थी फोन पर, लेकिन जैसे जैसे शादी नजदीक आने लगी, उन लोगों की डिमांड बढ़ने लगी"

🔴 डिमांड मतलब 'लड़की ने पूछा'

डिमांड का एक ही मतलब होता है, दहेज की डिमांड। परिवार में सबको सोने से बने तोहफे दो, दूल्हे को लग्जरी कार चाहिए, सास और ननद को नेकलेस दो वगैरह वगैरह, बोले हमारे यहाँ रीत है। लड़का भी इस रीत की अदायगी का पक्षधर था। वो सगाई मैंने येन केन प्रकरेण तुड़वा डाली.. फिर किसी तरह घरवालों को समझा बुझा कर मैं फ्रंट पर आ गया और हमारी शादी हो गई। ये सब किस्मत की बात थी.. 

लड़की बोली "चलो अच्छा हुआ आप मिल गए, वरना वो गलत लोगों में फंस जाती" 

मैंने कहा "जरूरी नहीं कि माँ पापा का फैसला हमेशा सही हो, और ये भी जरूरी नहीं कि प्रेमी जोड़े की पसन्द सही हो.. दोनों में से कोई भी गलत या सही हो सकता है.. नुक्ते की बात यहाँ ये है कि कौन ज्यादा फरमाबरदार और वफादार है।"

लड़की ने फिर से पानी का घूंट लिया और मैंने भी.. लड़की ने तर्क दिया कि "हमारा फैसला गलत हो जाए तो कोई बात नहीं, उन्हें ग्लानि नहीं होनी चाहिए"

मैंने कहा "फैसला ऐसा हो जो दोनों का हो, औलाद और माता पिता दोनों की सहमति, वो सबसे सही है। बुरा मत मानना मैं कहना चाहूंगा कि तुम्हारा फैसला तुम दोनों का है, जिसमे तुम्हारे पेरेंट्स शामिल नहीं है, ना ही तुम्हे इश्क का असली मतलब पता है अभी"

उसने पूछा "क्या है इश्क़ का सही अर्थ?" 

🔴 मैंने कहा "तुम इश्क में हो, तुम अपना सबकुछ छोड़कर चली आई ये इश्क़ है, तुमने अक़्ल का दखल नहीं दिया ये इश्क है, नफा नुकसान नहीं सोचा ये इश्क है...तुम्हारा दिमाग़ दुनियादारी के फितूर से बिल्कुल खाली था, उस खाली स्पेस में इश्क इनस्टॉल कर दिया गया। जिसने इश्क को इनस्टॉल किया वो इश्क में नहीं है.. यानि तुम जिसके साथ जा रही हो वो इश्क में नहीं, बल्कि होशियारी हीरोगिरी में है। जो इश्क में होता है वो इतनी प्लानिंग नहीं कर पाता है, तीन ट्रेनें नहीं बदलवा पाता है, उसका दिमाग इतना काम ही नहीं कर पाता.. कोई कहे मैं आशिक हुँ, और वो शातिर भी हो ये नामुमकिन है। मजनू इश्क में पागल हो गया था, लोग पत्थर मारते थे उसे, इश्क में उसकी पहचान तक मिट गई। उसे दुनिया मजून के नाम से जानती है जबकि उसका असली नाम कैस था जो नहीं इस्तेमाल किया जाता। वो शातिर होता तो कैस से मजनू ना बन पाता। फरहाद ने शीरीं के लिए पहाड़ों को खोदकर नहर निकाल डाली थी और उसी नहर में उसका लहू बहा था, वो इश्क़ था। इश्क़ में कोई फकीर हो गया, कोई जोगी हो गया, किसी मांझी ने पहाड़ तोड़कर रास्ता निकाल लिया..किसी ने अतिरिक्त दिमाग़ नहीं लगाया.. लालच हिर्स और हासिल करने का नाम इश्क़ नहीं है.. इश्क समर्पण करने को कहते हैं जिसमें इंसान सबसे पहले खुद का समर्पण करता है, जैसे तुमने किया, लेकिन तुम्हारा समर्पण हासिल करने के लिए था, यानि तुम्हारे इश्क में हिर्स की मिलावट हो गई । डॉ इकबाल का शेर है
"अक़्ल अय्यार है सौ भेष बदल लेती है
इश्क बेचारा ना मुल्ला है, ना ज़ाहिद, ना हकीम"

लकड़ी अचानक से खो सी गई.. उसकी खिलख़िलाहट और लपड़ापन एकदम से खमोशी में बदल गया.. मुझे लगा मैं कुछ ज्यादा बोल गया, फिर भी मैंने जारी रखा, मैंने कहा " प्यार तुम्हारे पापा तुमसे करते हैं, कुछ दिनों बाद उनका वजन आधा हो जाएगा, तुम्हारी माँ कई दिनों तक खाना नहीं खाएगी ना पानी पियेगी.. जबकि आपको अपने प्रेमी को आजमा कर देख लेना था, ना तो उसकी सेहत पर फर्क पड़ता, ना दिमाग़ पर, वो अक्लमंद है, अपने लिए अच्छा सोच लेता। आजकल गली मोहल्ले के हर तीसरे लौंडे लपाडे को जो इश्क हो जाता है, वो इश्क नहीं है, वो सिनेमा जैसा कुछ है। एक तरह की स्टंटबाजी, डेरिंग, अलग कुछ करने का फितूर..और कुछ नहीं। 

लड़की का चेहरे का रंग बदल गया, ऐसा लग रहा था वो अब यहाँ नहीं है, उसका दिमाग़ किसी अतीत में टहलने निकल गया है। मैं अपने फोन को स्क्रॉल करने लगा.. लेकिन मन की इंद्री उसकी तरफ थी। 

🔴 थोड़ी ही देर में उसका और मेरा स्टेशन आ गया.. बात कहाँ से निकली थी और कहाँ पहुँच गई.. उसके मोबाइल पर मैसेज टोन बजी, देखा, सिम एक्टिवेट हो चुकी थी.. उसने चुपचाप बैग में से आगे का टिकट निकाला और फाड़ दिया.. मुझे कहा एक कॉल करना है, मैंने मोबाइल दिया.. उसने नम्बर डायल करके कहा "सोरी पापा, और सिसक सिसक कर रोने लगी, सामने से पापा फोन पर बेटी को संभालने की कोशिश करने लगे.. उसने कहा पापा आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए मैं घर आ रही हूँ..दोनों तरफ से भावनाओ का सागर उमड़ पड़ा"

हम ट्रेन से उतरे, उसने फिर से पिन मांगी मैंने पिन दी.. 
उसने मोबाइल से सिम निकालकर तोड़ दी और पिन मुझे वापस कर दी।

(घर से भागने की सोचने वाले प्रेमी जोड़ो को समर्पित) 

एक कहानीकार  कलम से 
द्वारा "साथी"

Friday, September 27, 2019

अविद्या

11:23 AM 0

 🤔अविद्या🤔

एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा की बीरबल यह अविद्या क्या है ?





बीरबल ने बोला कि आप मुझे 4 दिनकी छुट्टी दे दो फिर मैं आपको बताऊंगा !

अकबर राजी हो गया और उसने चार दिनों की छुट्टी दे दी !

बीरबल मोची के पास गया और बोला कि भाई जूती बना दो,मोची ने नाप पूछी तो बीरबल ने बोला भैया ये नाप वाप कुछ नहीं। डेढ़ फुट लंबी और एक बित्ता चौड़ी बना दो,और इसमें हीरे जवाहरात जड देना । सोने और चांदी के तारों से सिलाई कर देना और हाँ पैसे वैसे चिंता मत करना जितना मांगोगे उतना मिलेगा।

तो मोची ने भी कहा ठीक है भैया तीसरे दिन ले लेना !

तीसरे दिन जूती मिली तब पारितोषिक देने के पहले बीरबल ने उस मोची से एक ठोस आश्वासन ले लिया कि वह किसी भी हालात में इस जूती का कभी भी जिक्र नहीं करेगा यानि हर हालात में अनजान बना रहेगा ।

अब बीरबल ने एक जूती अपने पास रख ली और दूसरी मस्जिद में फेंक दी । जब सुबह मुल्ले नमाज पढ़ने (बाँग देने ) के लिए मस्जिद गए तो मौलवी को वो जूती वहाँ पर मिली ।

मौलवी ने सोचा यह जूती किसी इंसान की तो हो ही नहीं सकती जरूर अल्लाह नमाज पढ़ने आया होगा और उसकी छूट गई होगी।

तो उसने वह जूती अपने सर पर रखी, मत्थे में लगाई और खूब जूती को चाटा ।

क्यों ?

क्योंकि वह जूती अल्लाह की थी ना ।

वहां मौजूद सभी लोगों को दिखाया सब लोग बोलने लगे कि हां भाई यह जूती तो अल्लाह की रह गई उन्होंने भी उसको सर पर रखा और खूब चाटा।

यह बात अकबर तक गई।

अकबर ने बोला, मुझे भी दिखाओ ।

अकबर ने देखा और बोला यह तो अल्लाह की ही जूती है।

उसने भी उसे खूब चाटा, सर पर रखा और बोला इसे मस्जिद में ही अच्छी तरह अच्छे स्थान पर रख दो !

बीरबल की छुट्टी समाप्त हुई, वह आया बादशाह को सलाम ठोका और उतरा हुआ मुंह लेकर खड़ा हो गया।

अब अकबर ने बीरबल से पूछा कि क्या हो गया मुँह क्यों 10 कोने का बना रखा है।

तो बीरबल ने कहा राजासाहब हमारे यहां चोरी हो गई ।

अकबर बोला - क्या चोरी हो गया ?

बीरबल ने उत्तर दिया - हमारे परदादा की जूती थी चोर एक जूती उठा ले गया । एक बची हैः

अकबर ने पूछा कि क्या एक जूती तुम्हारे पास ही है ?

बीरबल ने कहा - जी मेरे पास ही है ।उसने वह जूती अकबर को दिखाई । अकबर का माथा ठनका और उसने मस्जिद से दूसरी जूती मंगाई और बोला या अल्लाह मैंने तो सोचा कि यह जूती अल्लाह की है मैंने तो इसे चाट चाट के चिकनी बना डाली

बीरबल ने कहा राजा साहब यही है अविद्या ।

यह कहानी सभी मतों, संप्रदाय पर  बिल्कुल सही बैठती है ।

पता कुछ भी नहीं और भेड़ चाल में चले जा रहे है।

😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂

Thursday, August 15, 2019

Indian Independence Day :

10:02 AM 0

Indian Independence Day : भारतीय स्वतंत्रता दिवस 

साथिओ आज हमने अपनी आज़ादी के 73 वे साल का जश्न मनाया देश, विदेश जहां पर भारतीय रचे बसे हैं सब ने अपना आज़ादी का दिवस त्यौहार के रूप में मनाया। 


हमें  गर्व है अपनी आज़ादी पर और गर्व है उन शहीद और आज़ादी के लड़ाकों पर जिनकी बदौलत हमें ये दिन देखना नसीब हुआ। 

हम आज  जोखुली हवा में साँस ले रहे है वो बहुत ही मुश्किल से हासिल हुयी है पर कुछ तथा कथित लोग इसको ऐसा नहीं मानते है , उनको  लगता है की ये आज़ादी बहुत ही सस्ती चीज है और कोई भी हासिल कर सकता है वो इसको राष्ट्रीय पर्व के रूप में नहीं मानते है कुछ धर्म विशेष के लोग इसको काला दिन के रूप में मानाने को तैयार बैठे है। 

जहां आज देश और विदेश में भारत का डंका बज रहा है और दुनियाँ भारत को सलाम ठोक रही है कुछ हराम के पिल्लै आज के दिन को काला दिन मानाने की बात कह रहे है और एक इंदिरेक्ट रूप से भारत के खिलाफ लड़ने की बात कर रहे है। 

असली आज़ादी 

दोस्तों जो आज़ादी हमको विरासत में मिली है शायद हमको इसके मायने भी नहीं पता है और हम कभी न कभी फ्रीडम फाइटर को किसी न किसी बहाने कोस  लेते हैं पर शायद हमको इस बात का कतई अंदाज़ा नहीं है की वो लोग कैसे रहे होंगे जिन्होंने अपने जीवन को अपने इस महान देश भारत पर कुर्बान  कर दिया। 

हम भूल जाते है की ये आज़ादी बहुत आहुतियां देने के बाद मिली है, मज़ाक  उड़ाते है अपने देश का, बेकार कहते हैं , रहने लायक नहीं है, ये मुल्क गरीब है , आदि आदि बातें सुनने देखने को मिल जाती है कुछ मौके और वतन परस्त लोगो ने इसको ऐसा बैसा कहा है।  ऐसा हरगिज़ नहीं है की मेरा देश जो ऊपर लिखा है उसमे से सही या गलत है हो सकता है ऐसे लोगो ने देश के किसी कौने में जाकर कुछ छोटा बड़ा देख लिया हो पर इसका मतलव बिलकुल नहीं है की मेरा देश रहने लायक नहीं है, गरीब है, बेकार है। ये उन लोगो की मानसिक बीमारी का संकेत है जो अपने आप कुछ अच्छा न कर पाने की स्थिति में अनाप सनाप बाके जा रहे है.

उनको आज़ादी चाहिए कुछ भी करने की , किसी को कुछ भी कहने की, कुछ भी अनाप सनाप लिखने बोलने की , किसी पर भी कीचड उछलने की, पर ऐसा तो मुमकिन नहीं है की आपको कुछ भी बोलने दिया जाए आपके मानवीय अधिकारों की ओट में। शुक्र कीजिये की आप भारत में  रहते है आप यदि कुछ ऐसे देश में होते जहा पर हर चीज की पावंदी है और कुछ भी बिना अनुमति के बोलने की इज़ाज़त नहीं है कल्पना कीजिये तब आप क्या करते।  ऐसे लोगो ने आज़ादी और मानव अधिकारों के नाम पर बक्शा नहीं जाना चाहिए। 

यही तो असली आज़ादी है सब के लिए जो आप करना चाहते है कर सकते है जहा जाना चाहते हैं जा सकते है , कुछ भी कर सकते है और क्या चाहिए आपको अगर नहीं पसंद है ये देश तो आप शौक से जा सकते हैं वह जहा पर आपकी जरुरत  भी नहीं है। भारत दुनियाँ का ऐसा मुल्क है जहा पर हर धर्म , संप्रदाय , जाती , भासा के लोग बिना किसी भेदभाव के रहते है, और ये हमको हमारा हक़ हमारा सविधान देता है जिसकी बदौलत सब यहाँ पर सही खुसी रहते है। 

नहीं है अभी भी पूरी आज़ादी 

ये वाक्य में इस लिए बोल रहा  हूँ की आज़ादी के कितने ही साल बिताने के बाद भी हम अपने समाज में जो कुरीतियां फैली है उनको समूल रूप से नहीं मिटा पाए जिसका हमको रंज है। देश के कुछ हिस्से जहा पर शिक्षा का प्रसार नहीं है वह पर धार्मिक पाखंडो ने हमारे समाज को जकड रखा है  दहेज़ प्रथा, घूंघट प्रथा , नारी घर की चार दीवारी में ही रहेगी, लड़की पैदा होने पर ही मार देना, बाल मज़दूरी , बाल विवाह , दूसरा विवाह नहीं" ऐसे कई ज्वलनशील मुद्दे हैं जिनको आगे लाना बहुत ही जरुरी है।  यदि हमको समाज में फैली इन कुरीतिओं को मिटाना है तो समाज को शिक्षित करना होगा।  महिलाओं को समाज को हिस्सा बनाना होगा, उनको उनके अधिकार देने होंगे, पढ़ना लिखना होगा।  नारी को वो सम्मान देना होगा जिसकी  हक़दार है, वो सिर्फ बच्चो को सँभालने या घर ही काम करने के लिए नहीं है वो सब कुछ कर सकती है वो पुरुष  प्रधान समाज कर रहा है। अभी भी हमारे पढ़े लिखे समाज में लड़कियों के जीन्स, टॉप, पैंट पहनने , मोबाइल का प्रयोग नहीं करने के असभ्य बर्ताव किये जाने के यदा कदा वाकये देखने को मिल जाते है , क्या वाकई में हमने इस समाज की कल्पना की थी ?

महिलाओं को अपने अधिकारों के बारे में कुछ नहीं बताया जाता उनका हर तरफ से शोषण होता है, शादी में दहेज़ काम या न लाने पर मारपीट करना , घर से बहार कर देना , मायके भेज देना , यहाँ तक की उसकी हत्या भी करना जायज माना  गया है। घूंघट करना एक रस्म है जो माननी ही पड़ेगी , नारी को सिर्फ और सिर्फ घर का काम करना पड़ेगा बहार नहीं जा सकती है , यदि लड़की पैदा हो गयी तो समझ लो की पता नहीं क्या हो गया और उसको बड़ा गलत व्यव्हार का सामना करना पड़ेगा , यहाँ तक की उसका पति शायद दूसरे विवाह की सोच ले, यदि किसी महिला का पति किसी कारन वश मर जाता है तब उस नारी का क्या हाल होता है कल्पना करना ही बहुत बड़ी बात है उसको डायन , पति को खा गयी , पिशाचनी  कहते हैं , बाल का मुंडन कर दिया जाट है।  ये वो गुलामी की जंजीरें है जो हम खुद ही अपने पैरों में डाले हुए है। इनको तोड़ना बहुत जरुरी है। 


आज भी हमारे  पढ़े लिखे समाज में महिलाओं की स्तिथि बदतर है उनको वो नहीं करने दिया जाता जो वो कर सकती है , उनको समाज , धर्म , परिवार की रूढ़िवादी परंपराओं की दुहाई देकर उनके अधिकारों का शोषण किया जाता है पर उनकी सिसकियाँ घर की चार दीवारी में ही घुट के रह जाती है। कई कई बार तो सामाजिक संस्थाओं ने महिलाओं को मौत के मुँह से निकला है।  लड़की पैदा होने पर तरह तरह के  ताने देकर उसका परिवार में ही शोषड़ होता है। बिना महिलाओं की समाज व् परिवार में भागीदारी के हम उन्नति  नहीं कर सकते हैं। 

गुलामी के कारक 

हम भले ही अंग्रेजों की दासता से आज़ाद हुए हो पर वास्तविक गुलामी हमने आज तक ओढ़ राखी है वो हमारे अपने ही बनाये हुए धागो की चादर है , जिनसे हम आज़ाद होना चाहते है पर हो नहीं प् रहे हैं , चाहे हम यू कहे की हम होना नहीं चाहते या फिर यूं कहिये की हममें इच्छा शक्ति की कमी है पर होना हर  चाहता है , पर शुरुआत कौन करे। 

यदि हम बात करें हमे अन्न देने वाले किसान की तो हालत अभी भी ठीक नहीं है , हां लेकिन कुछ सालों में बहुत सुधार हुआ है , पर ये काफी नहीं है, जिन चीजों की किसान को जरुरत होती है वो नहीं समय से नहीं मिलता है लिहाज़ा काफी नुक्सान होता है , बिजली सप्लाई , खाद , उर्वरक , बीज, कीटनाशक , पानी जैसी गंभीर समस्याएं हैं।  यदि ये सब मिल गया तो कोई नहीं कह सकता ही मौसम क्या गजब ढहायेगा , फसल ख़राब होती है जिसके कारन बैंक का कर्ज समय से नहीं दे पता लिहाज़ा कर्ज बढ़ने पर आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ते है। कर्ज में डूबा किसान क्या कर सकते है।  देश प्रदेश की सरकारों को चाहिए की वो किसानो को आने वाली हर समस्या को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कदम उठाये। 


मूलभूत कारक है जो हमको आज भी गुलामी की जंज़ीरों में जकड़े हुए है। 

अशिक्षा 
गरीबी 
भुखमरी 
धार्मिक पाखंड 
जातिवाद 
धार्मिक रूढ़िवादी विचार 
भ्रस्टाचार 
क्षेत्रवाद 
भाई-भतीजावाद 
परिवारवाद 


लिखने को तो बहुत है अगर लिखे बैठ जाऊंगा तब शायद में बूढ़ा हो चूका होऊँगा। पर शायद मुझे लगता है की अगर हमने इन चीजों पर काबू पा लिया तो हम कह सकेंगे की हम सौ फ़ीसदी स्वंत्रत हो चुके है और उस दिन हमको अपने आप पर गर्व होगा। 

जय हिन्द 
जय जवान , जय किसान 

Sunday, August 11, 2019

Mobile se bikharte parivar

1:56 AM 0

मेरा परिवार और मोबाइल और में 

यह आत्म कथा किसी की हो सकती है अगर हमने अपने आप और अपने परिवार तथा बाहरी निर्जीव चीजों में सामजस्य नहीं बैठाया तो परिणाम काफी घातक होंगे। गहन चिंतन करने की जरुरत है समय मिले तो जरूर सोचिये। 


मैं बिस्तर पर से उठा,अचानक छाती में दर्द होने लगा मुझे... हार्ट की तकलीफ तो नहीं है. ..? ऐसे विचारों के साथ. ..मैं आगे वाले बैठक के कमरे में गया...मैंने नज़र की...कि मेरा परिवार मोबाइल में व्यस्त था...
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मैने... पत्नी को देखकर कहा...काव्या थोड़ा छाती में रोज से आज ज़्यादा दुख रहा है...डाॅक्टर को बताकर आता हूं. ..हां, मगर संभलकर जाना...काम हो तो फोन करना  (मोबाइल में देखते देखते हि काव्या बोली...

मैं... एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पंहुचा... पसीना,मुझे बहुत आ रहा था...ऐकटिवा स्टार्ट नहीं हो रहा था...
ऐसे वक्त्त... हमारे घर का काम करने वाला ध्रुव सायकल लेकर आया... सायकल को ताला मारते हि उसे मैने मेरे सामने खडा देखा...क्यों साब. ऐकटिवा चालू नहीं हो रहा है...मैंने कहा नहीं...

आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती साब... इतना पसीना क्यों आया है ? 

साब... स्कूटर को किक इस हालत में नहीं मारते....मैं किक मारके चालू कर देता हूं...ध्रुव ने एक ही किक मारकर ऐकटिवा चालू कर दिया, साथ ही पूछा..साब अकेले जा रहे हो ?

मैंने कहा... हां ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते...चलिए मेरे पीछे बैठ जाइए...मैंने कहा तुम्हे एक्टिवा चलाने आता है  ? साब... गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता  छोड़कर बैठ जाओ...

पास ही एक अस्पताल में हम पंहुचे, ध्रुव दौड़कर अंदर गया, और व्हील चेयर लेकर बाहर आया...साब... अब चलना नहीं, इस कुर्सी पर बैठ जाओ..

ध्रुव के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रही...मैं समझ गया था... फ्लैट में से सबके फोन आते होंगे..कि अब तक क्यों नहीं आया  ? ध्रुव ने आखिर थक कर किसी को कह दिया कि... आज नहीँ आ सकता....

ध्रुव डाॅक्टर के जैसे ही व्यवहार कर रहा था...उसे बगैर पूछे मालूम हो गया था कि, साब को हार्ट की तकलीफ हो रही है... लिफ्ट में से व्हील चेयर ICU कि तरफ लेकर गया....

डाॅक्टरों की टीम तो तैयार ही थी... मेरी तकलीफ सुनकर... सब टेस्ट शीघ्र ही किये... डाॅक्टर ने कहा, आप समय पर पहुंच गए हो....इस में भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया...वह आपके लिए बहुत फायदेमंद रहा...
अब... कोई भी प्रकार की राह देखना... वह आपके लिए हानिकारक होगी...इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन करके आपके ब्लोकेज जल्द ही दूर करने होंगे...इस फार्म पर आप के स्वजन की सही की ज़रूरत है...डाॅक्टर ध्रुव को सामने देखा...

मैंने कहा , बेटे, दस्तखत करने आती है  ? साब इतनी बड़ी जवाबदारी मुझ पर न रखो...

बेटे... तुम्हारी कोई जवाबदारी नहीं है... तुम्हारे साथ भले ही लहू का संबंध नहीं है... फिर भी बगैर कहे तुमने तुम्हारी जवाबदारी पूरी की, वह जवाबदारी हकीकत में मेरे परिवार की थी...एक और जवाबदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे लिखकर सही करके लिख दूंगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जवाबदारी मेरी है, ध्रुव ने सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर  किये हैं, बस अब. ..

और हां, घर फोन लगा कर खबर कर दो...

बस, उसी समय मेरे सामने, मेरी पत्नी काव्या का मोबाइल ध्रुव के मोबाइल पर आया.वह शांति से काव्या को सुनने लगा...

थोड़ी देर के बाद ध्रुव बोला, मैडम, आपको पगार काटने का हो तो काटना, निकालने का हो तो निकाल दो , मगर अभी अस्पताल ऑपरेशन शुरु होने के पहले पंहुच जाओ. हां मैडम, मैं साब को अस्पताल लेकर आया हूं. डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है, और राह देखने की कोई जरूरत नहीं है...

मैंने कहा, बेटा घर से फोन था...?

हा साब. 

मैंने मन में सोचा, काव्या तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही है, और किस को निकालने की बात कर रही हो ? आंखों में आंसू के साथ ध्रुव के कंधे पर हाथ रख कर, मैं बोला,बेटा चिंता नहीं करते।।

मैं एक संस्था में सेवाएं देता हूं, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, वहां तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत है.
तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है...बेटा. ..पगार मिलेगा, इसलिए चिंता ना करना. 

ऑपरेशन बाद, मैं होश में आया... मेरे सामने मेरा पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था, मैं आंखों में आंसू के साथ बोला, ध्रुव कंहां है  ?

काव्या बोली-: वो अभी ही छुट्टी लेकर गांव गया, कहता था, उसके पिताजी हार्ट अटैक में गुज़र गऐ है... 15 दिन के बाद फिर से आयेगा.

अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे में उसका बाप दिखता होगा...

हे प्रभु, मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया !

पूरा परिवार हाथ जोड़कर , मूक नतमस्तक माफी मांग रहा था...

एक मोबाइल की लत (व्यसन)...अपने व्यक्ति को अपने दिल से कितना दूर लेकर जाता है... वह परिवार देख रहा था....

डाॅक्टर ने आकर कहा, सब से पहले यह बताइए ध्रुव भाई आप के क्या लगते  ?

मैंने कहा डाॅक्टर साहब,  कुछ संबंधों के नाम या गहराई तक न जाएं तो ही बेहतर होगा उससे संबंध की गरिमा बनी रहेगी. 

बस मैं इतना ही कहूंगा कि, वो आपात स्थिति में मेरे लिए फरिश्ता बन कर आया था !

पिन्टू बोला :- हमको माफ करो पप्पा... जो फर्ज़ हमारा था,  वह ध्रुव ने पूरा किया, वह हमारे लिए शर्मजनक है, अब से ऐसी भूल भविष्य में कभी भी नहीं होगी. ..

बेटा,जवाबदारी और नसीहत (सलाह) लोगों को देने के लिए ही होती है...
जब लेने की घड़ी आये, तब लोग ऊपर नीचे (या बग़ल झाकते है) हो जातें है.

      अब रही मोबाइल की बात...

बेटे, एक निर्जीव खिलोने ने,जीवित खिलोने को गुलाम कर दिया है, समय आ गया है, कि उसका मर्यादित उपयोग करना है,

नहीं तो....      👇👇

परिवार, समाज और राष्ट्र को उसके गंभीर परिणाम भुगतने पडेंगे और उसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना पड़ेगा.

Monday, August 5, 2019

Рынок в индийской системе образования

2:25 AM 0

Обучение профессии: метод рыночного образования


Первое образование было подарком, которое было наполнено тяжелым трудом, страстью и честностью без денег, затем постепенно оно начало давать другие вещи в обмен на деньги и медленно, когда наше образование продавалось и продавалось Никто не узнал об этом. Этого не произошло вообще, но это произошло очень упорядоченно и нездорово, даже когда никто не присоединился к процессу физического удовольствия в образовании, и когда наш учитель и учитель начали брать деньги и другие вещи в обмен на образование Даже не знал, что он ушел.

Сбор жадности и богатства испортил путь воспитания:

Абсолютно верно, что сегодня невозможно получить образование без денег. Говоря о сегодняшнем дне, будь то учителя или студенты, оба обманывают друг друга. Родители просто должны зарабатывать деньги. То, что делает ребенок, это не отвлекать их от этого вопроса. Они хотят, чтобы нашему ребенку не было дела до денег, которые преподаются в любой основной школе или на тренировке. Наше образование разрушено. Учитель также хочет, чтобы, если детям не нужно было читать или читать, им приходилось только часами учить, как они даже кусаются. Школы, операторы-тренеры платят много денег и ничего с этим не делают, так как все змеи обнюхивают, с некоторыми оправданиями, родители продолжают резать себе карманы. Официальная школа находится в плохом состоянии, куда никто не хочет ходить, кроме очень бедных детей, ни один офицер не собирается на них смотреть. Учитель также приходит время от времени, так что сплетни продолжают умирать на солнце.

Человек из среднего класса не хочет отправлять своих детей в государственную школу, он хочет, чтобы мои дети получали хорошее образование, но в частной школе он не получает ничего особенного, кроме грабежей. Имя иногда называют названием сборов, и мы ничего не делаем. Эта система образования окажется для нашего времени очень роковой, а название образования - Амул. Если будут удалены Намо следы архитектурных. Все хотят денег, даже если они не получают очереди за счет будущего детей, частные институты разграбили только за грабеж, никто не готов их выслушать. Правительственные чиновники так много делают, но когда речь заходит о том, чтобы читать своих детей в государственных школах, Канни приводит множество аргументов.

Уровень образования падает:

У нас снижается уровень образования, который нужно исправить без промедления, иначе будет слишком поздно. Наши правительства ведут много переговоров, но нет четкого плана по улучшению образования, и при этом у него нет конкретных указаний в этом отношении. Такой закон не может быть принят, если это очень хороший план, кроме предвидения будущего детей. Студенты на занятиях не в кинотеатрах, клубах, парках, кафе, ресторанах, пабах, и здесь нет рикш. Просмотр фильмов на мобильном телефоне распространен в классе. Там нет внимания к учебе, никто не может никого остановить, потому что был принят закон о том, что нельзя ругать студентов. Варна - это нарушение прав человека. Она начинается с уничтожения нашего образования. Сегодня попросите некоторых студентов послушать гору 15-ти лет, повеселиться, дать слушание или рассказать кому-нибудь, как написано на хинди, как написано и, как говорят, используется. Это наша классная система образования, это жаль и потому, что мы давно учились, иначе сегодня мы не сможем ничего читать.

Сегодняшнее телевидение, кино погубило каждого ученика, все, кто живет в кино, любящие привязанность и мелкую любовь и останавливающиеся, стали учениками каждого ученика. Когда вы видите и делаете такие вещи в храме образования, вы даже не можете себе представить, что вас и наше общество и образование называют. Это не один студент номер один, который также стал предметом обсуждения в дни романтики учителей, даже когда условие таково, что он скажет. Это требует глубокого обдумывания. Мы не хотим менять q, потому что, во-первых, есть две причины, наши ценности такие или у нас есть такие мысли внутри нас, а во-вторых, мы ничего не можем сделать, потому что случилось с нами, которые поженились в делах других.

Частные школы, колледжи, коучинговые центры:

Сегодня школы, колледжи, тренерские центры открыли магазин повсюду. Кажется, что это скорее магазины, чем учебные заведения. Улица, квартал, они открылись на дороге, чтобы ограбить вас. Большой - с большими предложениями, которые будут хорошо смотреться в любых условиях, и вы застрянете в нем.

Ответственность правительства:

Если вы собираетесь принять ребенка, то вы поедете куда-нибудь еще. Видеть рекламу по телевизору, мобильным телефонам и рекламным щитам в городе - это одно и то же, чтобы удовлетворить одну вещь. В школе будет красивый портье, который будет приветствовать вас, будет приветствовать вас, предложит вам холодно, жарко, а затем расскажет вам обо всех преимуществах этого учреждения и заставит детей больших и старших должностных лиц читать и настаивать на получении этого образования. После этого вы будете вынуждены ограбить, с формы приема вам будет предъявлено обвинение в размере платы за освобождение, и вы будете вынуждены ее предоставить. Это происходит повсеместно в школах, колледжах, в тренерских центрах с простым человеком, если возникнет проблема, некому будет слушать. Если вы подаете жалобу в правительство

Thursday, July 25, 2019

मेरा ग्वालियर, स्वच्छ ग्वालियर,

4:37 AM 0
गन्दगी के ढेर पर ग्वालियर शहर 
मेरा ग्वालियर, स्वच्छ ग्वालियर, कितना अच्छा और सुन्दर  लगता है जब हम ये कहते सुनते किसी को देखते हैं , पर हक़ीक़त में सब कुछ उल्टा है पैसा पानी की तरह बहकर हम अपने ग्वालियर शहर को गंदगी मुक्त नहीं कर पाए और देखने वाली बात तो यह है की हम देखने के बाद भी इन सब बातों को नज़र अंदाज़ कर रहे है। स्वछता की बातें तो बस किताबों , अखबारों, न्यूज़, मैगज़ीन, इंटरनेट पर हम सब करते है पर वो नहीं करते है जो हमको करना चाहिए बस हम एक दूसरे को दोष देने में बहुत आगे है और यही नहीं हमारे जिम्मेदार अधिकारी, कर्मचारी, नेतागण सब एक दूसरे पर टालते हुए नज़र आते हैं। आज शहर में कचरे और गंदगी के ढेर हर तरफ लगे हुए हैं जिनको उठाने की जहमत जिम्मेदार भी नहीं कर रहे है। 

कौन है गंदगी का जिम्मेदार ?

हम सब एक दूसरे पर गंदगी करने, फ़ैलाने का दोष लगते हैं, निगम अधिकारी कर्मचारी अपना  काम सही ढंग से  नहीं करते हैं आधा अधूरा काम करते हुए अपने कर्तव्य से इतिश्री कर  लेते हैं। नेता , सेलेब्रटी , अधिकारी भी फोटो खिचवाने तक ही स्वस्छता अभियान को आगे बढ़ने की बात कहते हैं पर उसके बाद धरातल पर सफाई  नज़र नहीं आती है। 

हम इस गंदगी को फ़ैलाने के लिए  जिम्मेदार हैं और कोई नहीं , हम हमेशा  घर का कचरा बहार सड़क पर, दूसरे के दरवाजे पर फेंकते हैं , डस्टबिन में नहीं डालते हैं, क्यू डालें ? क्या डस्टबिन में कचरा डालने से सफाई हो जाएगी, कोई मैडल मिलेगा, शाबाशी मिलेगी , लोग क्या कहेंगे डरपोक या फलां फलां बातें।  अगर हम सड़क पर कचरा फेंकते हैं तब हमको आत्मसम्मान महसूस होगा , शायद शाबाशी मिल जाये और  सड़क पर कचरा फैकने का मैडल ही मिल जाये और दबंगई की मिशाल कायम हो जाये अगर हम दूसरे से दरवाजे पर कचरा फेंक दे, वह क्या बात है मेरे प्यारे नगर वासिओ तुम को मेरा लाख लाख प्रणाम।  तुम जैसे लोग ही शहर की सुंदरता पर दाग और कलंक लगते हो। 

एक महत्वपर्ण बात इसमें हमारी माताओ बहिनो का बड़ा योगदान रहता है, वो ये  देखती हैं  की कोई देख तो नहीं रहा , अगर नहीं तो सारा कचरा कुछ ही देर में सड़क पर पड़ा दीखता है। ऐसे लोगो को  कोई मतलब नहीं है की आप सड़क पर चलें या कचरे पर सड़क पर कचरा है या कचरे  में सड़क, कोई खास फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हम कभी नहीं सुधर सकते हैं। भारत के प्रधान मंत्री तक सफाई करने झाड़ू लगते नज़र आते हैं  पर हम नहीं सुधर सकेंगे क्यूंकि आदत तो वही गंदगी में रहते की पड़ी है। 

निगम जिम्मेदार भी है गंदगी को फ़ैलाने में, जब भी कभी देखता हूँ की निगम की गाड़ी में कचरा भरा जा राजा है तब वो लोग बहुत सा कचरा ऐसे ही छोड़ देते हैं या फिर इधर उधर फैला देते हैं और जिस गाड़ी में कचरा लेजाया जा रहा होता है वो भी खुली हुयी होकर उसका भी कचरा सड़क पर फैलता है जो सफाई की हुयी जगह में गंदगी होती है।  
निगम के कर्मचारी भी एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर कचरा फेंक देते हैं।  जहा डंप यार्ड है वह पर न ले जाते हुए दूसरी जगह जला देते हैं या खली गद्दे में फेंक देते है जिससे बीमारियों के पैदा होने का गंभीर खतरा हमेशा बना  रहता है। 
हद तो तब हो जाती है जब सफाई के लिए ही एक कंपनी तो ठेका दे दिया गया है बाबजूद इसके की वो कंपनी भी अपना काम नहीं कर रही है, दिन प्रतिदिन कचरे के निपटान के लिए कोई खास कदम नहीं उठाये गए है।  कंपनी द्वारा सफारी कर्मचारिओं को मूल भूत सुविधा, समय पर वेतन न मिलना भी एक बहुत बड़ी समस्या है। 

शहर व अंचल के बड़े नामी गिरामी सरकारी अस्पताल का सफाई के मामले में बहुत बेकार हाल है, अभी कुछ दिन पहले सफाई कंपनी के कर्मचारिओं की मांगे कंपनी द्वारा पूरी न करने पर सफाई कर्मचारीओ द्वारा हड़ताल कर दी गयी थी जिसका सीधा सीधा ख़ामीजियाना मरीजों व् उनके अटेंडरों द्वारा भुगता गया जब मामले को मीडिया में लाया गया तब कुछ उठा पटक हुयी और निगम की सफाई टीम ने अस्पताल से एक दिन में 24 टन कचरा निकला जो बहुत ही ज्यादा है। 

हर रोज सड़कें साफ़ होती है पर कुछ देर बार वैसा का वैसा कचरा देखा जा सकता है क्यूंकि हम लापरवाह होते है इस बारे में कोई पहाल नहीं करना चाहता है , बस लापरवाही ही हमारा लक्ष्य है और हम हर प्रकार से इसको पूरा करना  चाहते हैं। 

बहाने बनाते निगम अफसर 

जब बात साफ सफाई पर  होती है तब निगम अफसर कई बहाने बनाकर जबाबदेही से बचते नज़र आते है , बजट नहीं है, कर्मियो की कमी , वाहनों की कमी, जरुरी संसाधनों की कमी  आदि बहाने बनाते है , जबकि सफाई जैसे महत्वपूर्ण कामो में इतना पैसा नहीं लगता है जितना बताया जाता है।  बजट में जनता का पैसा होता है और वो भी जनता के काम नहीं आता है और अफसर नेता मंत्री संत्री सब ऐसे के खा जाते है और जनता को सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिलता है। 

बारिश में होते सबसे खराब हालत 


अगर शहर में बारिश हो रही है तो गंदगी का आलम मत पूछो आपको हर जगह गंदगी देखने को मिल जाएगी।  कोई कचरा उठाने नहीं आता , आता भी है तो वो खाना पूर्ति करके चला जाता है।  दिनों तक कचरा नहीं उठ पता है।  सड़क पर यु ही कचरा फैलता रहता है जिससे बीमारियां फैलती  रहती है। यही कचरा नालियों में फस जाता है जिससे नालियां चौक हो जाती है और पानी रुक जाता है गटर बंद हो जाते हैं जिसके लिए हम भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। 




हम हर कदम पर ये सोच लें की हमको गंदगी नहीं करनी है तो गंदगी का नमो निशान तक नहीं होने वाला मगर हम नहीं करना  चाहते है दुसरो पर दोष देना हमारी आदत बन चुकी है हम कुछ भी कर लो नहीं सुधर सकते हैं। मगर हमको सुधरना होगा नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने घर ऑफिस को ही कचरे या डंपिंग यार्ड बना लेंगे। अधिकारिओ को जगाना होगा जो गहरी नींद में  सोये हुए है फटकार लगनी होगी , सवाल करने होंगे उनसे जुंको आपने चुना है याद दिलाना होगा की उन्होंए क्या  वादे किये था आपसे वोट मांगते टाइम। लोगो को जागरूक करना होगा सुधर करना होगा।


Wednesday, July 10, 2019

शिक्षा एक व्यवसाय : Market in Indian Education System

3:07 AM 0

शिक्षा एक व्यवसाय : बाज़ारू शिक्षा पद्धति 


पहले शिक्षा एक उपहार हुआ करता था जो बिना किसी धन के बस मेहनत, लगन , और ईमानदारी से पूरा हुआ करता था फिर धीरे - धीरे इसमें धन के बदले कुछ अन्य वस्तुए देने का प्रचलन चल पड़ा और धीरे से कब हमारी शिक्षा बाज़ारू और बिकने वाली हो गयी किसी को कुछ पता  नहीं चला। ये एकदम  नहीं हुआ है अपितु बहुत ही क्रमबद्ध और न पता चलने वाले तरीके से हुआ है यहाँ तक की शिक्षा में भौतिक सुख संसाधन कब जुड़ गए किसी को पता नहीं चला और हमारे गुरु व शिक्षक कब शिक्षा के बदले धन दौलत और अन्य वस्तुए लेने लग गए ये भी पता नहीं चला। 

लालच और धन संग्रह ने बिगाड़ा शिक्षा का तरीका :

ये बात बिलकुल सच्च है की बिना धन के आज शिक्षा को  प्राप्त करना असंभव है।  आज की बात करें तो चाहे  वो टीचर हों अथवा छात्र दोनों ही एक दूसरे को धोखा दे रहे हैं। माता पिता को बस पैसे कमाने की पड़ी है बच्चा क्या कर रहा है उनको इस बात से लेना देना नहीं है वो ये  चाहते है की हमारा बच्चा बस किसी बड़े स्कूल या कोचिंग में पढ़े पैसे की परवाह नहीं है वो कितना भी लग जाये इसी बात ने हमारी शिक्षा को बर्बाद कर दिया है।  टीचर भी ये  चाहते है की बच्चो को पढ़ना न पड़े अगर पढ़ना भी पड़े तो उनको तो बस अपने टीचिंग के घंटे काटना होते है वो  कैसे भी काट लेते हैं।  स्कूल, कोचिंग संचालक बहुत बड़ी फीस लेकर अड्मिशन देते हैं और कुछ न कुछ बहाने से अभिभावकों की जेब काटते रहते हैं इस पर कोई कुछ नहीं बोलता जैसे की सबको सांप सूंघ गया हो। सरकारी स्कूल तो वैसे भी ख़राब हालत में है जहा पर सिवाय बेहद गरीब बच्चों के अलावा कोई नहीं जाना चाहता है कोई अधिकारी वहा का जायजा लेने नहीं जाता है। टीचर भी यदा  कदा  आते हैं आते है तो धूप में गप्पें मरते रहते हैं। 

एक मिडिल क्लास आदमी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं भेजना चाहता है वो ये चाहता है की मेरे बच्चो को अच्छी शिक्षा मिले पर प्राइवेट स्कूल में भी उसको सिवाय लूटपाट के कुछ खास नहीं मिलता है।मोटी स्कूल व टूशन की फीस भरता है कही इसके नाम पर कभी उसके नाम पर फीस बसूली जाती है और हम कुछ नहीं कर पते हैं ये शिक्षा पद्धति हमारे आने वाले टाइम के लिए बहुत ही घातक सिद्ध होगी और शिक्षा नाम की अमूल्य वास्तु का नमो निशान मिट जायेगा। हर कोई पैसा कामना चाहता है चाहे वो बच्चो का भविष्य की कीमत पर ही क्यू न मिले , प्राइवेट संस्थानों ने बिना कट्टे , बन्दूक लिए ही लूट मचा राखी है कोई सुनने को तैयार नहीं। सरकारी अफसर बातें तो बहुत करते   है पर जब उनके बच्चो को सरकारी स्कूलों में  पढ़ने की बात आती है तो कन्नी काट लेते हैं और बहुत सी दलील दे डालते हैं। 

गिरता शिक्षा का स्तर :

हमारी शिक्षा का स्तर बहुत नीचे गिरता जा रहा है जिसको अभी बिना कोई विलम्ब किये सुधारा जाना बहुत आवश्य्क है वार्ना बहुत देर हो चुकी होगी। हमारी सरकारें बाते बहुत करती है पर शिक्षा में सुधर के लिए कोई ठोस योजना नहीं है और न ही इस संबध में को ठोस निर्देश। ऐसा कोई कानून नहीं बन सकता है जहा पर ये लगे की बहुत ही शानदार योजना है सिवाय बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए। क्लासो में स्टूडेंट नहीं हैं सिनेमा , क्लब, पार्को , कैफ़े , रेस्टोरेंट , पब में स्टूडेंट्स मिलते हैं कोई रोकटोक नहीं है। क्लास में ही मोबाइल पर मूवीज देखना आम बात है। पढाई पर कोई ध्यान नहीं है किसी को रोक नहीं सकते क्यूंकि कानून ऐसा बना दिया गया है की आप स्टूडेंट्स को डांट भी नहीं सकते वार्ना मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है यही से सुरु होता है हमारी शिक्षा का सत्यानाश। आज किसी स्टूडेंट्स को पूछ लो की 15 का पहाड़ा सुना दे , मजाल  है कोई सुना दे अथवा कोई ये बता दे की हिंदी बारहखड़ी कैसे लिखी जाती है या कैसे लिखी जाती है और इसका उपयोग कहा होता है। ये है हमारी बिंदास शिक्षा पद्धति, अफ़सोस होता है और फ़र्क़ भी क्यूंकि हमने बहुत  पहले पढ़ लिया वार्ना आज  कुछ नहीं पढ़ पाते। 

आज का टीवी , सिनेमा ने हर स्टूडेंट का सत्यानाश कर दिया है हर कोई  सिनेमा में होने वाली घटना को जी रहा है , प्यार मुहबत और छिछोरापन , आवारगी करना हर स्टूडेंट का सगल बन गया है। जब शिक्षा के मंदिर में ऐसी चीजे देखने और करने को मिल जाये तो  आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं की आप और हमारा समाज और शिक्षा कहा जा रही है। अकेले छात्र की नहीं अव्वल हो ये है की टीचर्स का भी रोमांस आये दिन चर्चा का विषय बन गया है जब हालत ऐसे हो तब क्या कहियेगा। गहरे चिंतन की जरुरत है ये। हम क्यू नहीं बदलना चाहते हैं दो कारण है पहला हमारे संस्कार ही कुछ ऐसे हो या हमारे अंदर ही ऐसे विचार हो और दूसरा हम कुछ नहीं कर कर सकते क्यूंकि हमको क्या पड़ी जो दूसरों के मामलों में युहीं  पड़े। 

प्राइवेट स्कूल्स , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स :

आज हर जगह स्कूल्ज , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स दुकान लेके खुल गए हैं।  ऐसा लगता है की ये शिक्षा की स्थान न होकर दुकान हैं।  गली , मोहल्ले , सड़क पर ये खुल चुके हैं आपको लूटने के लिए। बड़े - बड़े ऑफर्स के साथ जो आपको हर हालत में अच्छे लगेंगे और कही न कंही आप इनमें फंस जायेंगे। 

अगर आप अपने बच्चे के एडमिशन के लिए जा रहे है तो आप कही न की तो  जायेंगे ही।  टीवी , मोबाइल , और शहर में होर्डिंग्स पर लगे विज्ञापन को देखकर जरूर एक बात की तसल्ली लेने की वाकई वही है जो दिखाया गया है।  स्कूल्ज में एक खूबसूरत  रिसेप्शनिस्ट बैठी होगी  जो आपको वेलकम करेगी फिर आपकी आवभगत करेगी ठंडा , गरम ऑफर करेगी फिर आपको उस संस्था की तमाम खूबियों का बखान करेगी और फलां और बड़े अधिकारिओं के बच्चों के पढ़ने का दवा करेगी और आपको वह पर अड्मिशन दिलाने में जोर लगा देगी फिर सुरु होगा आपको लूटने का सिलसिला , एड्मिशन फॉर्म से लेकर आपसे एग्जाम फी तक की वसूल की जाएगी और आप मजबूर होके देते जायेंगे। ये हर जगह स्कूल्ज , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स में आम आदमी के साथ होता है अगर कोई प्रॉब्लम है तो सुनने वाला कोई नहीं होगा।  अगर आप सरकार में कोई शिकायत करते हैं तो भी आपने हाथ हर हालत में निराशा ही लगेगी।  इनमे आपने हर चीज की 100 गुणा कीमत वसूली जाएगी, किताबों , ड्रेस , बेल्ट, शूज , बैग्स  यहाँ तक की आपका बच्चा लंच में क्या खायेगा स्कूल्ज ही निर्धारण करेंगे। 

सरकार की जिम्मेदारी :

स्कूलों , कॉलेजेस , कोचिंग सेंटर्स की मनमानी को रोकने के लिए सरकार  द्वारा किये गए प्रयास नफाफी हैं। कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए है इस सम्बन्ध में न ही कोई कारवाही का निर्धारण किया गया है। इनकी मनमानी जोरो पर है। कोई भी सरकारी अधिकारी इन संस्थानों का निरीक्षण नहीं करता ना ही वो ये प्रयास करता है की वह पर कैसा चल रहा है शिक्षा की प्रक्रिया कैसे चलते हैं ये लोग। क्या फीस ली जा रही है और फीस के बदले उनको क्या शिक्षा दी रही है वो सही है। जिससे शिक्षा का बेडा गर्क हो रहा है। 

इसे क्या समझा जाये की सरकार के नुमाइंदे ही शिक्षा पद्त्ति को बर्बाद करने में तुले हुए हैं। या फिर सरकार द्वारा एक मोटी रकम लेकर अपने कर्त्वयों से नाता तोड़ लेते हैं या फिर  संस्थानों के मालिकों द्वारा सरकारी मामलो में बड़ा हस्तक्षप रहता है। 











Monday, July 1, 2019

एक तलाक़ ऐसा भी

3:19 AM 0

कागज का एक टुकड़ा.


राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।

दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे।

चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।

राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन  दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।

राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे।  दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।

इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।

सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।

नवीन घर मे अकेला ही रहता था।  मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं।

राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।

घर मे प्रवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से  धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।

सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।

नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला "ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा"
राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।

वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर  समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।

प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।

न राधिका लौटी और न नवीन लाने गया।

राधिका की माँ बोली" कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?"

"चुप रहो माँ"

राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया।

बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।

राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही।  फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया।

नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया " रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।"

गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी।

"क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था"

"कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।"

सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।

"नही चाहिए।

वो दस लाख भी नही चाहिए"

 "क्यूँ?" कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।

"बस यूँ ही" राधिका ने मुँह फेर लिया।

"इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।"

इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।

राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।

राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।

वो रो रहा था, अजीब सा मुँह बना कर,  जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।

मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।

सधे अंदाज में बोली "इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?"

"मैंने नही तलाक तुमने दिया"

"दस्तखत तो तुमने भी किए"

"माफी नही माँग सकते थे?"

"मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।"

"घर भी आ सकते थे"?

"हिम्मत नही थी?"

राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। "अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया"

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी।

राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।"

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र  वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।

कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से? एक तलाक़ ऐसा भी 

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।
कितने सुनहरे दिन थे वो।

इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।

बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।

अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला--" मत जाओ,,, माफ कर दो"

शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।

और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।
दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि, कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?

आजकल की दौड़भाग भरी ज़िंदगी में हम अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलते जा रहे हैं।  बेकार की चीजों में अपना कीमती समय बर्बाद कर  रहे हैं। ये कहानी हमको बहुत बड़ी सीख देती है , की हम अपने बेकार के अभिमान के नशे में चूर हो के अपने रिश्तों को ख़तम कर रहे हैं।  हमने अपने मनं  की आँखें बंद  कर राखी हैं जिनको खोलके जीने की जरुरत है।  

आशा करता हु कहानी आपको पसंद आयी होगी ये कहने की जरुरत नहीं है की ये हर इंसान की व् उसके घर की कहानी है , ऐसा  हमारी आपकी ज़िंदगी में अक्सर होता है।  यही को हमारी आपकी असली दुनियां है। 

Friday, June 28, 2019

भारतीय शादी

1:26 AM 0

भारतीय शादी में खाने का आनंद 


शादी मे (buffer) खाने में वो आनंद नहीं जो पंगत में
आता था जैसे....
👉 पहले जगह रोकना !
👉 बिना फटे पत्तल दोनों का सिलेक्शन!
👉 उतारे हुयें चप्पल जूतें
पर आधा ध्यान रखना...!
👉 फिर पत्तल पे ग्लास रखकर उड़ने से रोकना!
👉 नमक रखने वाले को जगह बताना
यहां रख नमक
.
सब्जी देने वाले को गाइड करना
हिला के दे
या तरी तरी देना!
.
👉 उँगलियों के इशारे से 2 लड्डू और गुलाब जामुन,
काजू कतली लेना
.
👉 पूडी छाँट छाँट के
और
गरम गरम लेना !.
👉 पीछे वाली पंगत में झांक के देखना क्या क्या आ
गया !
अपने इधर और क्या बाकी है।
जो बाकी है उसके लिए आवाज लगाना
.
👉 पास वाले रिश्तेदार के पत्तल में जबरदस्ती पूडी
🍪 रखवाना !
.
👉 रायते वाले को दूर से आता देखकर फटाफट रायते
का दोना पीना ।
.
👉 पहले वाली पंगत कितनी देर में उठेगी। उसके
हिसाब से बैठने की पोजीसन बनाना।
.
👉 और आखिर में पानी वाले को खोजना।
 😜
..............
एक बात बोलु
इनकार मत करना
मज़ा आया

😊

Monday, June 24, 2019

हमारा समाज क्या कर रहा है

11:28 PM 0

 हमारे अपने समाज के प्रति कर्तव्य 


प्राय: देखने को मिलता है कि हम अपने कर्तव्य से विमुख होते जा रहे हैं तथा जो काम हमारे स्वयं की करने के हैं, उनको हम एक दूसरे के माथे मरने से बाज नहीं आ रहे हैं लेकिन इससे ना तो हम अपने आप की उन्नति कर सकते हैं और ना ही हम अपने समाज की उन्नति कर सकते हैं।  इसके लिए हमको प्रयत्न यह करना होगा कि जो कार्य हमें ही करना है स्वयं इसके लिए हमें जिम्मेदार हैं वह हम अपने पूर्ण विश्वास के साथ करें तथा दूसरों को अपने अपने कर्तव्य तथा स्वयं के कार्यों को स्वयं के द्वारा संपन्न किए जाने हेतु प्रेरित करेंl

सरकार नहीं करती मदद ऐसे बहुत सारे कार हैं जो बिना सरकार की मदद की भी पूर्ण हो सकते हैं लेकिन हम हैं कि उनको सरकार के भरोसे ही छोड़ रखे हैं जैसे कि अपने गली मोहल्लों की साफ सफाई इधर उधर कचरा ना पाएंगे साथ ही बेफिजूल का पानी बर्बाद ना करें ना तो उससे सड़क को साफ करें ना ही पशुओं को महिलाएं अथवा वाहनों को खुली सड़क पर पानी से धोएं ऐसा करने से हम अपने संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं गर्मी में पानी की किल्लत बढ़ जाती है लिहाजा हमें पानी बचाना होगा कई क्षेत्रों में यह देखने को मिलता है कि गली मोहल्लों में लोग अपने घर के सामने की सड़क तथा पशुओं को नहीं लाते हुए मिलते हैं जबकि हम सबको यह भली-भांति ज्ञात है की पानी की एक-एक बूंद बहुत कीमती है भविष्य में यह जो पानी अभी मुक्त उपलब्ध हो रहा है वह किसी दिन बोतलों में बिका करेगा इन दिनों से पानी नहीं आएगा यह एक भयानक सकते हैं और पानी की मारामारी इतनी बढ़ जाएगी कि आए दिन लड़ाई झगड़े तथा दूसरे देशों के साथ युद्ध के हालात निर्मित हो जाएंगे इसलिए हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर रोक लगानी होगी

 समाज में वैमनस्यता ना रखें 

प्रायः देखने में आता है कि गली मोहल्लों कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के बीच में अक्सर छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़ा हो जाता है तथा नौबत यहां तक आ जाती है कि मारपीट गाली गलौज जैसी घटनाएं हो जाती हैं तथा पुलिस थानों में रिपोर्ट हो जाती है जिससे कि क्षेत्र का माहौल खराब होता है तथा बच्चे भी बड़ों का अनुसरण करते हैं जिससे कि उनकी भविष्य तथा सोचने की क्षमता पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है हमें चाहिए कि हम छोटी-छोटी बातों पर ध्यान ना देकर लड़ाई झगड़ा ना करें तथा आपस में प्रेम मोहब्बत से ही रहें l

बिजली पानी तथा टैक्स की चोरी

यदि हम अपने आप मैं एक जिम्मेदार नागरिक की जिम्मेदारी उठाते हैं तो भविष्य में हम किसी भी प्रकार से परेशान नहीं होंगे यह इस प्रकार की गारंटी है हम चाहते हैं कि हम बिजली का भरपूर उपयोग करें तथा उसका हमें कोई दिल ना देना पड़े, एसी चलाएं, पंखे चलाएं, कूलर चलाएं, फ्रीज  चलाएं और भी कई प्रकार की बिजली से चलने वाली मशीनों को चलाएं उनसे हम काम निकाले तथा उसका हमें कोई पैसा ना देना पड़े, ऐसा हम लगभग 90% लोग सोचते हैं, और करते भी यह है कि हम किसी ना किसी रूप में बिजली चोरी करते हैं जिससे होता यह है कि बिजली की खपत अधिक होती है जिसके साथ साथ लागत भी बहुत बढ़ जाती है तथा शासन को नुकसान होता है जिसके कारण शासन हम पर बिजली की दरों को बढ़ाकर हमसे ही बस ूलता है। 

Tax Chori

हम यह चाहते हैं कि हम जो कर रहे हैं वह सरकार से छुपा रहे तथा कई प्रकार की वस्तुएं हम खरीदते रहे अथवा जमीन मकान या फैक्ट्री कुछ भी हो हम सरकार को टैक्स नहीं देना चाहते हैं, लेकिन सुविधाएं हम सरकार से सब कुछ चाहते हैं।  ऐसा हो नहीं सकता है कि हम बिना पैसे के सभी सुविधाएं पालें अक्सर यह देखने को मिलता है कि व्यापारी वर्ग आम आदमी धनाढ्य वर्ग चाहता है, कि उसको टैक्स न देना पड़े और अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, अच्छी सड़कें और अच्छी कालोनियां चाहिए पर टैक्स न देना पड़े जिससे होता है कि सरकार पर जो जमा पैसा रहता है वह यूं ही ऐसे कामों में खर्च हो जाता है और टैक्स का पैसा मिलता नहीं है जिससे कि वह आम आदमी के लिए विकास के कार्य नहीं करा पाती है।  हमें अपनी इस आदतों पर विराम लगाना पड़ेगा जिससे कि हम अपने भविष्य को सुंदर बना सके हमें टैक्स जमा करना चाहिए पूरी ईमानदारी के साथ अपने देश के आगे बढ़ने मैं अपना पूर्ण योगदान देना अति आवश्यक है l

पानी की चोरी

ऐसा नहीं है कि चोरी करने के लिए सिर्फ रुपया पैसा अथवा कहने या और भी अमूल्य चीजें हैं जिनको चुराया अथवा लूटा जा सके आज के युग में पानी भी एक ऐसा अनमोल रत्न है जिसको लूटा अथवा चुराया जा रहा है। और हम समझते हैं कि हमने बहुत बड़ा काम कर लिया है हमने पानी चुरा लिया है और शासन अथवा फलां व्यक्ति को इसका पता नहीं चला।  ऐसा नहीं है कि आपने जो किया है वह किसी से छिपा है परंतु आप कर क्या रहे हैं अपने मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर ऐसा कृत्य कर रहे हैं, जिसका माफीनामा प्रकृति के पास भी मौजूद नहीं है।  आदमी पानी की बूंद के लिए तरस रहा है और कुछ लोग हैं जो पानी को चोरी कर उससे मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।  पानी को बेच रहे हैं पानी जो कि प्रकृति के द्वारा दिया जाने वाला एक अमूल्य उपहार है जो मानव को मुफ्त में मिलता है उसको बेचा जा रहा है और शासन तथा प्रकृति को एक प्रकार से चुना लगा  रहे हैं।  हमें ऐसी कार पुजारियों का हरकतों से बचना होगा बता पानी चोरी पर अंकुश लगाना होगा नहीं तो 1 दिन ऐसा आएगा कि हम पानी की एक बूंद के लिए भी तरस जायेंगे। 

 लोगों को शिक्षित बनाना


वह दिन बीत चुके हैं जहां पर लोग कहते थे कि शिक्षा सभी का अधिकार है आज के युग में शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है।  जगह-जगह पर कोचिंग स्कूल कॉलेज खुल गए हैं जो कि शिक्षा के नाम पर अभिभावकों तथा छात्रों को लूट रहे हैं।  शिक्षा नाम की चिड़िया किस किसी के द्वारा देखी गई है यह कोई नहीं बता सकता है ,परंतु हां इस बात की गारंटी है कि आप किसी भी स्कूल कॉलेज कोचिंग में चले जाइए वहां पर आपको इस विषय से संबंधित कुछ विषय से संबंधित कुछ भी ज्ञान अथवा जानकारी प्राप्त करना हो तो उसके लिए आपको एक मोटी फीस चुकानी पड़ेगी और मोटी फीस चुकाना हर आदमी के बस में नहीं है। आज के इस महंगाई के जमाने में लेकिन होता यह है कि हम इसके लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं हम ज्यादातर दिखावे के लिए महंगे स्कूल कॉलेजों मैं अपने बच्चों को भेज रहे हैं और शिक्षा के नाम पर उनको वहां पर कुछ नहीं मिल रहा है और इसका नतीजा यह है कि बेरोजगारी अपने चरम पर है ना तो इसके लिए सरकार कोई नीतियां बनाती है और ना ही इसके लिए कोई ठोस कदम उठाती है सरकार के दावे खोखले हो रहे हैं तथा आम जनता मर रही है और सरकार के नुमाइंदे कोई कारवाही नहीं करते हैं जिससे होता ये है की शिक्षा माफिया बेख़ौफ़ होके अपना काम  कर रहा है।  सरकार को चाहिए की वो ऐसा करने वालो के खिलाफ कारवाही करे।

भ्र्ष्टाचार

भ्र्ष्टाचार की जड़े हमारे समाज में किस कदर फ़ैल चुकी हैं इस  बात  का अन्दाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है।  ऐसा नहीं है की बिभिन्न विभागों में बैठे अधिकारी और कर्मचारी ही भृष्ट हैं।  अगर सही माईने में देखा जाये तो भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा देने वाली सरकार ही है।  जहां आम आदमी का पाला सर्कार से नहीं पड़ता है।  वही दूसरी और हर काम के लिए सरकार के अपने नीचे ऐसे लोग बिठा रखे हैं जो किसी भी काम को करवाने   के लिए एक निच्छित रकम लेकर किसी भी काम को करवा देते हैं, चाहे वो किसी पुल, डेम , सड़क, बिल्डिंग इत्यादि के ठेके लेना हो सब काम में पैसा चलता हैं ऊपर से नीचे तक हर कोई भ्र्ष्टाचार में डूबा हैं।  जिसका नतीजा आम जनता को कभी कभी अपनी जान देकर चुकाना  पड़ता हैं।  भ्र्ष्टाचार ऐसे ही नहीं फैला हैं हर तरफ इसको फ़ैलाने में हमारे समाज की बहुत बड़ी भूमिका रही है या यूँ कह सकते हैं की समाज के कुछ लालची ठेकेदार टाइप के लोग इस गंदगी को फ़ैलाने में सफल रहे।  ऐसा नहीं है की भ्र्ष्टाचार अभी 20 - 50 साल पहले आया हो ये हो बहुत  पुराना है हमारे समाज में। राजा महाराजा  के ज़माने से है।  परन्तु इतना नहीं फैला था कैंसर की तरह  हमारे समाज को खाये जा रहा है और आज भी समाज के कुछ ठेकेदार टीवी पर बैठ कर भूँकते रहते हैं करता कोई कुछ नहीं है क्यूंकि अगर मैंने ऐसा नही किया तो मेरा काम नहीं होगा , मुझे यहाँ से हटाकर वह भेज दिया जायेगा , मेरे बच्चे अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ पाएंगे , अच्छा घर नहीं बन पायेगा समाज में मेरी इज़्ज़त नहीं होगी और बहुत सी बातें। हम अपने अंतर्मन की आवाज़ को अनसुना कर रहे है , लालच ने हमको इस कदर अँधा बहरा कर दिया है की हम एक मुर्दे की तरह हो गए है।  हम स्वार्थी होकर अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं।  हम समाज को क्या दे रहे हैं।  कोई नियम पर नहीं चलना चाहता है , हर कोई एक दूसरे से आगे निकलना चाहता है।  आये दिन न्यूज़ ने देखने सुनने को मिल जाता है की फलां पल गिरा, डेम टुटा , सड़क बही , बिल्डिंग गिरी ये सब भ्र्ष्टाचार  नतीजा है।

हम आज उस समाज का हिस्सा है जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी, हम अपने भविष्य को क्या देना चाहते हैं।  समाज सुधारक हैं पर स्वामी दयानन्द , विवेकानन्द, राजा राममोहन राय जैसे नहीं हैं।  आजकल के तो एक दलाल की तरह बैठकर भूँकते हैं समाज के लिए करते कुछ नहीं है, बस फोटो खींचा ली, बहुत हो गया जैसे की समाज पर इन्होने बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो , बेशरम लोग। हम भी कुछ काम नहीं हैं उनकी हाँ में हाँ मिलाकर चलते हैं नहीं देखते की क्या अच्छा है क्या बुरा है। ऐसे समाज को नरक कहा जाये हो कुछ बुरा नहीं होगा। हमें जरुरत है एक ऐसे समाज की जो परिपूर्ण हो।

ऐसा समाज का निर्माण होना संभव है जब हम स्वार्थी जीवन से बहार आकर लोगो को जागृत करेंगे तब ऐसा संभव है। त्याग करना होगा, एक कीमत चुकानी पड़ेगी, तब जाके ऐसे सभ्य और परिपूर्ण समाज का निर्माण हो सकेगा और तब हम गर्व से कह सकेंगे की मेरा भारत महान।