ग्वालियर की प्रमुख समस्याऐं:
पेयजल:आज ग्वालियर की आबादी इतनी बढ़ चुकी है कि संपूर्ण शहर की पेयजल व्यवस्था चरमरा गई है, धरती में अनगिनत छेद किये जा चुके हैं और लगातार जारी है। जल स्तर अपने निम्नतम् स्तर से भी नीचे चला गया है, 1000 फुट से भी नीचे जा चुका है। शहर को जीवन देने वाले डेम तिघरा ही एक मात्र सहारा है, चम्बल से पानी लाने हेतु कोई ठोस एवं सार्थक प्रयास सरकारों के नहीं किये गये हैं। इसमें कई प्रकार की अनियमितता सामने आ चुकी हैं। पहले ही चम्बल से पानी लाये जाने हेेतु करोड़ों रूपये लागत बताकर तथा सरकार के पास धनराशि न होना बताया जा रहा है। अल्पवर्षा भी इसका मुख्य कारण है। जितना पानी मानव के द्वारा उपयोग किया जाता है उतना जमीन में नहीं जा पाता है। पेड़ों की लगातार कटाई, मानव निवास हेतु अधिक से अधिक कालोनियों कां विकसित होना, आबादी का लगातार बढ़ना, दीगर प्रांतों से पलायन कर यहां पर बसने वालों की तादाद काफी है, मैं समझता हूं कि ग्वालियर की जनता जो कि जिला ग्वालियर की है के अतिरिक्त 50 फीसदी लोग दीगर राज्यों, जिलों से आकर यहां पर बस रहे हैं इस कारण से यहां की पेयजल व्यवस्था गड़बड़ा गई है। पीने हेतु पानी की किल्लत बनी हुई है। देखने में आ रहा है कि, कई बस्ती के लोग रात-रात भर जागकर पानी की व्यवस्था में लगे रहते हैं। पेयजल व्यवस्था को ठीक करने के प्रयास भी नगर निगम के द्वारा किये जाते रहे हैं परन्तु वह नाकाफी रहे हैं। लगातार बनने वाली इमारतों में भी पानी काफी मात्रा में खर्च किया जाता है जिस पर कोई रोक नहीं हैं। सरकारी तंत्र मौन एवं अंधा बना हुआ है। जनता के प्रतिनिधी भी इस और ध्यान नहीं देते हैं जिससे समस्या और भी विकराल रूप धारण कर रही है। गर्मियों में पानी का उपयोग 5 गुना हो जाता है। कहीं पर लोग पानी की एक बंूद के लिये तरस रहे हैं और कहीं पर अपने आप को बुद्धिजीवी एवं पढ़ालिखा इंसान कहने वाले पानी से गाड़ियां, सड़के धो रहे हैं तथा गाय भैंस को नहला रहे हैं। कहीं मौहल्ले में बोरिंग पर बाहुबलियों का कब्जा है दूसरों को पानी का उपयोग नहीं करने देते हैं। सरकारी तंत्र मूक दर्शक बना रहता है, इस प्रकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है। मारपीट, झगड़े की नौबत आ जाती है कई बार इस प्रकार की घटनाऐं हो चुकी हैं हत्या तक हो गई हैं, परन्तु जिम्मेदार लोग आंख बंद किये हुये हैं। शिकायतें भी हुई हैं परन्तु कुछ कार्यवाही नहीं हुई है। हमें इस ओर सख्त कदम उठाने होंगें। शहर में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से डाली जाने वाली पाईपलाईनों में गड़बड़ी भी देखने को मिलती है। यहां पर भी कमीशनखोरी तथा भ्रष्टाचार काफी हद तक हावी है जिसका खामिजियाना आम जनता को उठाना पड़ रहा है। एक मात्र विकल्प है कि आमजनता को जागरूक होना होगा, सरकारी तंत्र से सवाल पूछने होगें काम अपनी निगरानी में कराना होगा। शिकवा शिकायत करने से कुछ नहीं होगा, जनप्रतिनिधियों को आगे रखकर अपनी बात उपर तक पहुंचानी होगी, अपने पानी के उपयोग को कम करना होगा, पानी को बचाना होगा। वाटर हारवेस्टिंग प्रणाली अपनानी होगा। अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगें, पानी के महत्व को समझना होगा तब ही हम इस और कुछ सार्थक कर पायेगें।
बेराजगारीः
बेरोजगारी भी ग्वालियर की बहुत बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। ग्वालियर में उद्योग धंधे बंद होने की कगार पर हैं, प्रतिस्पर्धा का युग है। कारखाने एवं मिले बंद हो चुके हैं आदमी बेरोजगार है। ग्रेसिम एवं जेसी मिल जैसी बड़ी मिले बंद हो चुकी हैं जिनसे हजारों लोग बेरोजगारी की गहरी खाई में चले गये। एक समय था जब ग्वालियर रोजगार देने में अव्वल था और आज ये दौर है कि ग्वालियर से काम करने वाले लोग बाहर जा रहे हैं। इस मुख्य कारण है राजनैतिक, गुण्डागर्दी, वसूली, कामचोरी आदि हैं। अधिकतर छात्र जो कि पढ़ लिख गये हैं परन्तु कोई नौकरी नहीं हैं काम धन्धा नहीं हैं क्या करें, खर्चों में कटौती नहीं कर सकते हैं परिणाम चोरी, लूट, डकैती, अपहरण कर फिरौती वसूल करना जैसे जघन्य अपराधों में युवा लिप्त हो रहा है। आये दिन समाचार पत्रों में इस प्रकार की घटनाओं का प्रकाशन होता रहता है। पढ़ाई भी काफी खर्चीली हो चुकी है। लाखों रूपये खर्च का डिग्री हासिल की जाती है परन्तु मनचाही नौकरी नहीं मिलती है।



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